top of page

भारत में स्वयं सहायता समूह का सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य

  • Mar 20, 2024
  • 1 min read

Updated: Mar 24, 2024

नीलू रानी*

शोध छात्रा, समाजशास्त्र विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविध्यालय, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

डा0 मनीष कुमार पाण्डेय**

सहायक आचार्य, समाजशास्त्र विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविध्यालय, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

संक्षेपण

यह लेख भारत में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य की जांच करता है, जो ऐसे लोगों का एक स्वैच्छिक संघ है जो समान समस्याओं और लक्ष्यों को साझा करते हैं और जो उन्हें दूर करने के लिए एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। लेख भारत में एसएचजी की ऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पत्ति का पता लगाता है और हाशिए पर रहने वाले समूहों, विशेषकर महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण में उनकी भूमिका और प्रभाव का विश्लेषण करता है। लेख बदलती नीतियों, संस्थानों और बाजारों के संदर्भ में एसएचजी के सामने आने वाली चुनौतियों और अवसरों पर भी चर्चा करता है। लेख में तर्क दिया गया है कि एसएचजी सामाजिक परिवर्तन और विकास के एक संभावित एजेंट हैं, लेकिन उन्हें एक सक्षम वातावरण द्वारा समर्थित होने की आवश्यकता है जो उनकी स्वायत्तता, विविधता और नवाचार को पहचानता है और उनका सम्मान करता है। लेख भारत में एसएचजी पर भविष्य के अनुसंधान और अभ्यास के लिए कुछ दिशा-निर्देश सुझाते हुए समाप्त होता है। 


प्रमुख शब्द

स्वयं सहायता समूह, भारत, सशक्तिकरण, हाशियाकरण, सामूहिक कार्यवाही, विकास



भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्वास्थ्य बीमा का प्रभाव: एक व्यापक विश्लेषण

अखिलेश कुमार सरोज* एम०ए०, बी०एड०, एस०आर०के०पी०जी०कॉलेज, फिरोजाबाद(डा०भीमरावअम्बेडकरविश्वविद्यालय, आगरा) प्रो०एस०के०वर्मा **...

 
 
SVAJRS Helpdesk Graphics (5).png
bottom of page